गुरु अर्थात ज्ञान का वो प्रकाश पूंज जो शिष्य के अन्धकार रूपी अज्ञान को समाप्त करके उसे और सार्थक मनुष्य बनाता है. कुमति कीच चेला भरा, गुरु ज्ञान जल होय | जनम – जनम का मोरचा, पल में डारे धोया ||

गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima) का दिन हिंदू धर्म में बेहद खास माना जाता है. इस दिन गुरुओं की पूजा की जाती है. मान्यता है कि इस दिन आदिगुरु, महाभारत के रचयिता और चार वेदों के व्‍याख्‍याता महर्षि कृष्‍ण द्वैपायन व्‍यास यानी कि महर्षि वेद व्‍यास (Ved Vyas) का जन्‍म हुआ थागुरु पूर्णिमा (Guru Purnima) का दिन हिंदू धर्म में बेहद खास माना जाता है. इस दिन गुरुओं की पूजा की जाती है. मान्यता है कि इस दिन आदिगुरु, महाभारत के रचयिता और चार वेदों के व्‍याख्‍याता महर्षि कृष्‍ण द्वैपायन व्‍यास यानी कि महर्षि वेद व्‍यास (Ved Vyas) का जन्‍म हुआ था.

परम् आदरणीय गुरुदेव श्री श्री1008 श्री नन्दरामशरण जी महाराज पिताम्बर गाल सिलोरा, पुष्कर, रामसखा आश्रम क्र मंगल दर्शन लाभ प्राप्त करने हुवे
परम् आदरणीय गुरुदेव श्री श्री1008 श्री नन्दरामशरण जी महाराज पिताम्बर गाल, सिलोरा, किशनगढ़- अजमेर पुष्कर, रामसखा आश्रम क्र मंगल दर्शन लाभ प्राप्त करने हुवे;
BL Sharma GKMorwal& Kavi Mukesh Molwa
Guru BL Sharma GK Morwal & Kavi Mukesh Molwa

 

गुरु अर्थात ज्ञान का वो प्रकाश पूंज जो शिष्य के अन्धकार रूपी अज्ञान को समाप्त करके उसे और सार्थक मनुष्य बनाता है | संत कबीर ने बड़े ही सुन्दर दोहे में गुरु शिष्य का सम्बन्ध बताया है |गुरु महिमा सनातन धर्म में गुरु शिष्य की परम्परा अनंत काल पूर्व से चली आ रही है | रामायण , महाभारत और कलियुग काल में बड़े बड़े राजाओ ने गुरु से शिक्षा प्राप्त कर शास्त्र और शस्त्र विद्या का ज्ञान प्राप्त कर अपने जीवन को धन्य किया ही |

श्री श्री1008 श्री महंत रेवती रमनदास जी महाराज "बपजी महाराज" ब्लड केम्प के दौरान पदार्पण
श्री श्री1008 श्री महंत रेवती रमनदास जी महाराज “बपजी महाराज” ब्लड केम्प के दौरान पदार्पण

संत कबीर के गुरु महिमा के प्रसिद्ध दोहे

कुमति कीच चेला भरा, गुरु ज्ञान जल होय |
जनम – जनम का मोरचा, पल में डारे धोया ||

कुबुद्धि रूपी कीचड़ से शिष्य भरा है, गुरु का ज्ञान जल है | इनमे इतना सामर्थ्य है की वे शिष्यों के जन्म जन्म का अज्ञान पल भर में दूर कर देते है |

गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि – गढ़ि काढ़ै खोट |
अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट ||


मिट्टी के बर्तन समान शिष्य के लिए गुरु कुम्हार की तरह होते है | जैसे कुम्हार मिट्टी के घड़े के निर्माण के समय अन्दर से सहारा देकर बाहर चोट देकर उसे तैयार करता है | उसी तरह गुरु भी शिष्य को आंतरिक रूप से मजबूत करके उसकी बाहरी सभी बुराइयों को नष्ट करता है |

भगवान से भी बड़े बताये गये है गुरु

गुरु की महिमा अपार और अनंत है जो शब्दों से बयान नही होती | मनुष्य का सबसे पहला गुरु माँ होती है जो उसे सबसे पहले जीना सिखाती है | फिर उसके बाद उसके पिता फिर वो सब गुरु है जो उसे सीख देते है | धार्मिक किताबो में बताया गया है की बिना गुरु के ईश्वर को नही पाया जा सकता है | क्योकि बिना गुरु के हम पशु समान है और तब हम अज्ञान में ही जीते है और ईश्वर में विश्वास नही करते |

हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर 

जब भगवान रूठ जाये तो गुरु सहारा दे देते है पर यदि गुरु ही रूठ गये तो उसे कोई सहारा नही देता |


गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णु र्गुरूदेवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥ 

गुरु ब्रह्मा विष्णु और महेश तीनो के सामान है | गुरु तो सबसे बड़ी सत्ता ब्रह्म भी है | इसी कारण सबसे बड़ी शक्ति (गुरु ) को नमन है |

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शुभ कर्मों में कुशलता ही योग है अर्थात् शुभ कर्मों को कुशलतापूर्वक करना ही योग है। इस अर्थ में ‘योग’ शब्द से मानसिक, बौद्धिक एवं शारीरिक समन्वयन एवं तादात्म्य अभिप्रेत है। यानि मन, बुद्धि एवं शरीर इन तीनों को एक साथ जोड़कर जब हम कोई कार्य करते हैं तो निश्चित ही उस कार्य में कुशलता या संपूर्ण दक्षता प्राप्त होती है, जिसे योग कहते हैं। व्यावहारिक परिप्रेक्ष्य में, यह अर्थ सटीक है एवं सफलता के सूत्र-रूप में स्वीकार्य है। आधिदैविक या अलौकिक परिप्रेक्ष्य में इसका भावार्थ यह है कि यदि कुशलतापूर्वक अर्थात् मन, बुद्धि एवं क्रिया तीनों के ही संयोग से यदि जप-तपादि अनुष्ठान किया जाए तो निश्चित ही अभीष्ट (शक्ति/सिद्धि) से योग (या संयोग) होता है।

जीवन में योग का महत्व और लाभ

आपके मन में एक प्रश्न बार-बार आता होगा की हम योग क्यों करें? जबकि हमें तो मानसिक और शारीरिक रूप से भी कोई समस्या भी नहीं हैं। जब हमारे पास समय ही नहीं हैं और हम स्वस्थ भी है तो फिर हमें योग की क्या आवश्यकता है। आज हम अपने इस लेख से आपके क्यों को दूर करने की पूरी कोशिश करेंगे और आपको जीवन में योग का महत्व समझाएंगे।

 

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर सम्मान पाने का अवसर प्राप्त हुआ
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर सम्मान प्राप्त करते हुए

योग हमारे शरीर के साथ-साथ हमारे मन को भी स्वस्थ रखता है। योग से आनंद की अनुभूति होती है जैसे एक तरफ सुख और दूसरी तरफ दुःख होता है जबकि आनंद सुख से भी ऊपर होता है। जब पहली बार योग करते है तब समझ में आता है आनंद क्या होता है। उस आनंद की अनुभूति ना भोग में, ना संभोग में और ना ही अन्य किसी क्षणिक सुखों में है।

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योग शब्द के दो अर्थ बताये गये हैं और दोनों ही अर्थ जीवन के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। पहला अर्थ है – जोड़ और दूसरा अर्थ है – समाधि (ध्यान)। जब तक हम अपने शरीर को योग कला से नहीं जोड़ते, ध्यान तक जाना असंभव हैं। ऊपर हमने जिस आनंद की चर्चा की उसकी सीढ़ी योग के दूसरे अर्थ ध्यान से शुरू होती है।

ध्यान योग का अतिमहत्वपूर्ण भाग है। ध्यान के माध्यम से शरीर और मस्तिष्क का संगम होता है। ध्यान यानि मेडिटेशन का डंका हमारे देश से भी ज्यादा विदेशों में गूंज रहा है। आज के समय में जीवनयापन के लिए दिन-रात भाग-दौड़, काम का प्रेशर, रिश्तो में अविश्वास और दूरी आदि के कारण तनाव बहुत ही तेजी से बढ़ रहा है।

जीवन में योग का महत्व और लाभ 2

ऐसे माहौल में मेडिटेशन से बेहतर और कोई विकल्प नहीं है। ध्यान से मानसिक तनाव दूर होता है और मन को गहन आत्मिक शांति महसूस होती है जिससे कार्य शक्ति में वृद्धि होती है, नींद अच्छी आती है, मन की एकाग्रता एवं धारणा शक्ति बढती है।

आइये योग के पहले अर्थ को समझे। दुनिया में योग के नाम और प्रभाव से कोई अनजान नहीं है। विश्व को शहरीकरण के दौर में स्वस्थ रखने का रामबाण इलाज है योग। जिसके तर्ज पर ही 21 जून को विश्व योगा दिवस मनाया जाता है। योग सभी के लिए जरूरी है। योग दर्शन और धर्म से परे है और गणित से कुछ ज्यादा है। योग भारत की देन है विश्व को। पूरा विश्व इस कारण से भारत को विश्वगुरु मानता है और योग को अपना रहा है।

इसलिए योग को किसी धर्म विशेष से ना जोड़े। आइये जानें इसके क्या-क्या लाभ है। इसके नियमित अभ्‍यास से ना केवल सभी प्रकार की बीमारियां दूर होती हैं बल्कि नियमित योग करने से शरीर मजबूत भी होता हैं। सुबह दैनिक कार्य के पश्चात खुली हवा में बैठकर नियमित 20-30 मिनट योगा करने से शरीर सुन्दर और चुस्त-दुरुस्त बनता है। योग से मन को शांति मिलती है जिससे रक्त संचार ठीक रहता है और हृदय भी स्वस्थ रहता है।

 

जीवन में योग का महत्व और लाभ

1. शरीर को लचीला और मजबूत बनाता है – जिम में आप किसी खास अंग का ही व्यायाम कर पाते है जबकि योग से शरीर के संपूर्ण अंग प्रत्यंगों, ग्रंथियों का व्यायाम होता है। जिस वजह से हमारे सारे अंग सुचारू रूप से अपना कार्य करते है क्योंकि योग से हमारे शरीर के अंगों को बल मिलता है जिससे हमारा शरीर दिन-प्रतिदिन लचीला और मजबूत होता जाता है।

2. तरो-ताजा और स्फूर्ति बनाए रखता है – नियमित योग से आप खुद को प्रकृति के नजदीक महसूस करते हैं जिससे आप पूरे दिन तरोताजा और स्फूर्ति महसूस करते है। मानसिक तौर पर भी आप शांत रहेंगे जिससे तनाव भी दूर होगा।

3. मन को रखे शांत – जब मन-मस्तिष्क शांत होंगे तो तनाव भी दूर होगा। नियमित योग आसनों और ध्यान से मस्तिष्क शांत होता है और शरीर संतुलित रहता है। योग से दिमाग के दोनों हिस्से दुरुस्त काम करते है जिससे आंतरिक संचार ठीक होता है। नियमित योग से सोचने की क्षमता और सृजनात्मकता वाले हिस्सों में संतुलन बढ़ता है। इससे बुद्धि तेज और शार्प होती है साथ ही आत्मनियंत्रण की शक्ति में भी तेजी से वृद्धि होती है।

4. रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाए – योगाभ्यास से चेहरे पर चमक आती है। शरीर में दिन-प्रतिदिन रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ती हैं। बुढ़ापे में भी स्वस्थ बने रहते हैं। शरीर निरोग, बलवान और स्वस्थ बनता है।

5. तनाव से रखे दूर – योग के नित्य अभ्यास से मांसपेशियों की अच्छी कसरत होती है। जिस कारण तनाव दूर होता है, ब्लड प्रेशर-कॉलस्ट्रॉल कंट्रोल होता है, नींद अच्छी आती है, भूख भी अच्छी लगती है और पाचन भी सही रहता है। इसके नियमित अभ्यास से तनाव धीरे-धीरे पूर्णरूप से खत्म हो जाता है।

6. दर्द और मोटापा से रखे दूर – योग से शरीर फ्लेक्सिबल होता है और शरीर को शक्ति मिलती है। इसके नियमित अभ्यास से पीठ, कमर, गर्दन, जोड़ों के दर्द की समस्या तो दूर होती ही है साथ ही योग आपके शरीर की खराब मुद्रा की संरचना को ठीक करता है जिससे भविष्य में होने वाले दर्द से बचा जा सकता है। नियमित योगा से शरीर की कैलोरी बर्न होती है और मोटापा घटते जाता है जिससे शरीर का वजन नियंत्रित रहता है।

7. रोग रखे दूर – योग से श्वास की गति पर नियंत्रण बढ़ता है जिससे श्वास सम्बन्धित रोगों में बहुत लाभ मिलता है जैसे दमा, एलर्जी, साइनोसाइटिस, पुराना नजला, सर्दी-जुकाम आदि रोगों में तो योग का ही अंग प्राणायाम बहुत फायदेमंद है। ऐसे आसन जिनमें कुछ समय के लिये सांस को रोक कर रखा जाता है।

जो हृदय, फेफड़े और धमनियों को स्वस्थ रखने में सहायक होता है। ऐसे आसन आपके दिल को फिट रखते हैं। इससे फेफड़ों को ऑक्सीजन लेने की क्षमता बढ़ती है जिससे शरीर की कोशिकाओं को ज्यादा ऑक्सीजन मिलता है। जिससे शरीर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

8. रक्त-संचार को सही करता है – विभिन्न प्रकार के योग और प्राणायाम से शरीर में रक्त का प्रभाव ठीक होता है। नित्य योग से मधुमेह का लेवल घटता है। यह बैड कोलेस्ट्रोल को कम करता है इस कारण मधुमेह के रोगियों के लिए योगा बेहद आवश्यक है। सही रक्त-संचार से शरीर को ऑक्सीजन और पोषक तत्वों का संवहन अच्छा होता है जिससे त्वचा और आन्तरिक अंग स्वस्थ बनते हैं।

9. प्रेगनेंसी में लाभ – गर्भावस्‍था के दौरान नियमित योगा करने से शरीर स्वस्थ रहता है। शरीर से थकान और तनाव दूर होता है जो माँ और बच्चे के स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है। गर्भावस्‍था में होने वाली कोई भी समस्या जैसे- पीठ दर्द, कमर दर्द, पैरों में खिचाव, नींद ना आना, चिड़चिड़ापन, अपच, श्वास संबंधित सभी समस्यायों से मुक्ति मिल जाती है।

गर्भावस्‍था के दौरान किस महीने में कौन-कौन से योगा कर सकते है इसकी सलाह अपने चिकित्सक से जरूर ले और योगा एक्सपर्ट की निगरानी में ही योगा करें।

10. मासिक धर्म में – योग के नित्य अभ्यास से मासिक धर्म में होने वाली पीड़ा से महिलाओं को मुक्ति मिलती है। पीरियड में नियमितता रहती है, शरीर में इस दौरान आलस, घबराहट, चक्कर आना जैसी समस्याओं से भी निजात मिलती है। शरीर में फुर्ती और चुस्ती बनी रहती है।

योग और ध्यान को अध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि से हमारे शरीर को स्वस्थ बनाने के लिए अनिवार्य माना गया है। योग सिर्फ शरीर को तोड़ने-मरोड़ने का दूसरा नाम नहीं हैं। सनातन योग के अद्भुत फायदों का लोहा सिर्फ भारत ही नहीं पूरे विश्व के लोगों ने माना है क्योंकि योग के माध्यम से मस्तिष्क और शरीर का संगम होता है।

योग का अभ्यास हमारे मन को संयमी बनाता है। योगाभ्यास से दुबला पतला व्यक्ति भी ताकतवर और बलवान बन जाता है। योग आपको अनुशासन समझाता है, योग आपके मन को तैयार करता है, योग आपको मैच्योर बनाता है, योग आपको अंधकार से बचाता है। योग उनके लिए है जो अपना जीवन सच में बदलना चाहते हैं, जो इस ब्रह्मांड के सत्य को समझना चाहते है, जो शक्ति सम्पन्न होना चाहते हैं और योग उनके लिए भी हैं जो हर तरह से स्वस्थ होना चाहते हैं।

योग आपको स्वस्थ और सुंदर बनाता है। आप चाहे किसी भी धर्म से हो, यदि आप स्वयं को बदलने के लिए वचनबद्ध है तो योग आपकी मदद अवश्य करेगा। अब आप स्वयं तय करें क‍ि आप योग क्यों करना चाहते है और क्यों नहीं करना चाहते हैं।

हम आपको यही सलाह देंगे, नियमित योग करे! अपने तन और मन को स्वस्थ रखे।

उम्मीद है जीवन में योग का महत्व और लाभ कि ये जानकारी आपको पसंद आयी होगी और आपके लिए फायदेमंद भी साबित होगी।

ज्ञान मूल शिक्षक सभी, मन का हरे विकार। जीवन में खुशियां भरे, लीला अपरम्पार।। ज्ञान मान विज्ञान से, गुरु को उन्नत जान। जल थल नभ के ज्ञान से, सीधा रिश्ता मान।। शिक्षक की शिक्षा हरे, तिहु लोक अंधकार। जड़ जंगम भी पा सके, पावन सा अधिकार।

श्रीचरणों में अनंत कोटि प्रणाम ||
गुरुवर के श्रीचरणों में अनंत कोटि प्रणाम || 

हमारे यहाँ एक कहावत बोलते हैं की गुरु बिन ज्ञान नही गुरु के बिना जिन्दगी का कोई मोल नही | इस लिये अपने जीवन में एक गुरु होना जरुरी हैं हम ये नहीं कहते की केवल आध्यात्मिक गुरु होता हैं | हर मोड़ पर व्यक्ति के  जीवन में अनेक गुरु आते हैं जैसे स्कूल में पढ़ाने वाला गुरु होता जो हमें शिक्षा देता उसी प्रकार हमारे माता पिता भी हमारे गुरु होते जो हमें जीने का डंग सीकाते  हैं इस प्रकार हर वो व्यक्ति जो हमें कुछ जान देता हैं जिस के कारण हमारी जिंदगी स्राथक होती हैं वो सब गुरु के जैसे हैं पौराणिक काल से ही गुरु ज्ञान के प्रसार के साथ-साथ समाज के विकास का बीड़ा उठाते रहे हैं। गुरु शब्द दो अक्षरों से मिलकर बना है- ‘गु’ का अर्थ होता है अंधकार (अज्ञान) एवं ‘रु’ का अर्थ होता है प्रकाश (ज्ञान)। गुरु हमें अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जाते हैं। शास्त्रों में गुरु का महत्त्व बहुत ऊँचा है। गुरु की कृपा के बिना भगवान् की प्राप्ति असंभव है। जिनके दर्शन मात्र से मन प्रसन्न होता है, अपने आप धैर्य और शांति आ जाती हैं, वे परम गुरु हैं। जिनकी रग-रग में ब्रह्म का तेज व्याप्त है, जिनका मुख मण्डल तेजोमय हो चुका है, उनके मुख मण्डल से ऐसी आभा निकलती है कि जो भी उनके समीप जाता है वह उस तेज से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता।

समाज और संसार में दया,सेवा ही श्रेष्ठ धर्म है।’ अगर अपने से दीन-हीन, असहाय, अभावग्रस्त, आश्रित, वृद्ध, विकलांग, जरूरतमंद व्यक्ति पर दया दिखाते हुए उसकी सेवा और सहायता न की जाए, तो समाज भला कैसे उन्नति करेगा?

सच तो यह है कि सेवा ही असल में मानव जीवन का सौंदर्य और शृंगार है। सेवा न केवल मानव जीवन की शोभा है, अपितु यह भगवान की सच्ची पूजा भी है। भूखे को भोजन देना, प्यासे को पानी पिलाना, विद्यारहितों को विद्या देना ही सच्ची मानवता है। सेवा से मिलता मेवा: दूसरों की सेवा से हमें पुण्य मिलता है- यह सही है, पर इससे तो हमें भी संतोष और अनुग्रह,संतुष्टि शांति प्राप्त होती है।

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पावन पुनित श्री राम महायज्ञ में सेवा करने सौभाग्य प्राप्त हुवा। 

परोपकार एक ऐसी भावना है, जिससे दूसरों का तो भला होता है, खुद को भी आत्म-संतोष मिलता है। मानव प्रकृति भी यही है कि जब वह इस प्रकार की किसी उचित व उत्तम दिशा में आगे बढ़ता है और इससे उसे जो उपलब्धि प्राप्त होती है, उससे उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। सौ हाथों से कमाएं, हजार हाथों से दान दें: अथर्व वेद में कहा गया है ‘शतहस्त समाहर सहस्त्र हस्त सं किर’। अर्थात् हे मानव, तू सैकड़ों हाथों से कमा और हजारों हाथों से दान कर। प्रकृति भी मनुष्य को कदम-कदम पर परोपकार की यही शिक्षा देती है। हमें प्रसन्न रखने और सुख देने के लिए फलों से लदे पेड़ अपनी समृद्धि लुटा देते हैं। पेड़-पौधे, जीव-जंतु उत्पन्न होते हैं, बढ़ते हैं और मानव का जितना भी उपकार कर सकते हैं, करते हैं तथा बाद में प्रकृति में लीन हो जाते हैं। उनके ऐसे व्यवहार से ऐसा लगता है कि इनका अस्तित्व ही दूसरों के लिए सुख-साधन जुटाने के लिए हुआ हो। सूर्य धूप का अपना कोष लुटा देता है और बदले में कुछ नहीं मांगता। चंद्रमा अपनी शीतल चांदनी से रात्रि को सुशोभित करता है। शांति की ओस टपकाता है और वह भी बिना कुछ मांगे व बिना किसी भेदभाव के। प्रकृति बिना किसी अपेक्षा के अपने कार्य में लगी है और इससे संसार-चक्र चल रहा है। दया है धर्म, परपीड़ा है पाप: दूसरों के साथ दयालुता का दृष्टिकोण अपनाने से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। इसी तरह अगर किसी को अकारण दुख दिया जाता है और उसे पीड़ा पहुंचाई जाती है, तो इसके समान कोई पाप नहीं है। ऋषि-मुनियों ने बार-बार कहा है कि धरती पर जन्म लेना उसी का सार्थक है, जो प्रकृति की भांति दूसरों की भलाई करने में प्रसन्नता का अनुभव करे। एक श्रेष्ठ मानव के लिए सिर्फ परोपकार करना ही काफी नहीं है, बल्कि इसके साथ-साथ देश और समाज की भलाई करना भी उसका धर्म है। बेशक, आज के युग में भी कुछ ऐसे लोग हैं, जो अपने सुखों को छोड़कर दूसरों की भलाई करने में और दूसरों का जीवन बचाने में अपना जीवन होम कर रहे हैं, पर साथ ही, कुछ ऐसे अभागे इंसान भी हैं, जिन्हें आतंक और अशांति फैलाने में आनंद की अनुभूति होती है। ऐसे लोग मानव होते हुए भी क्या कुछ खो रहे हैं, इसका उन्हें अहसास नहीं है। सबका हित, अपना हित: गीता (12.4) में लिखा है, ‘जो सब प्राणियों का हित करने में लगे हैं, वे मुझे ही प्राप्त करते हैं।’ विद्वान लोग विद्या देकर, वैद्य और डॉक्टर रोगियों की चिकित्सा करके, धनी व्यक्ति निर्धनों की सहायता करके तथा शेष लोग अपने प्रत्येक कार्य से सभी का हित करें, तो धरती पर मौजूदा सभी प्राणियों का भला हो सकता है। यही सच्ची भक्ति है। ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’- इस भाव को अपनाकर ही देश और समाज का भला हो सकता है। चाणक्य ने कहा था- ‘परोपकार ही जीवन है। जिस शरीर से धर्म नहीं हुआ, यज्ञ न हुआ और परोपकार न हो सका, उस शरीर का क्या लाभ?’ सेवा या परोपकार की भावना चाहे देश के प्रति हो या किसी व्यक्ति के प्रति, वह मानवता है।

अपने पर विश्वास रखो | Believe in yourself

दोस्तों आज मैं आपको एक ऐसे भ्रम (a myth) के बारे में बताने जा रहा हूँ जो बहुत सारे सफल होने वाले लोगों को अपनेमायाजाल में फंसाकर उनके आत्मविश्वास को तोड़ देता है और वह जिन्दगी जीने की बजाय अपनी परेशानियों (life problems) का रोना रोते हुए पूरी जिंदगी बिता देते हैं।
मैं बात कर रहा हूँ हमारे जीवन में आने वाली परेशानियों (life problems) के बारे में। ये आती तो सबके जीवन (life) में हैं चाहे वो अमीर हो या गरीब, बड़ा हो या छोटा, पापी हो या धर्मात्मा, मतलब सबके जीवन में।
जिनके पास धैर्य व दृढ़-इच्छाशक्ति होती है वह इसका पूरे आत्मविश्वास के साथ सामना करते हैं और इन परिस्थितियों सेजीत जाते हैं।
और वही कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो इन परिस्थितियों (circumstances) के आने पर इनका सामना करने की बजाय हजार बहाने बनाने लगते हैं जैसे – अरे मेरे साथ तो ये प्रॉब्लम (problem) है, वो दिक्कत है, इसमें तो इसकी गलती है, फलाना-ढ़माका और भी बहुत कुछ। और वो हार जाते हैं, असफल हो जाते हैं।
तो आईये इसको हम एक छोटी-सी कहानी के माध्यम से समझने की कोशिश करते हैं-
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बहुत समय पहले की बात है, एक राजा (King) ने एक भारी पत्थर का टुकड़ा रास्ते के बीच में रख दिया और खुद एक पेड़ के पीछे छिप गया। वह इंतजार करने लगा कि इस रास्ते के पत्थर को कौन हटाता है।
कुछ समय बाद वहाँ से राजा के कुछ धनी व्यापारी व दरबारी गुजरे लेकिन वे लोग पत्थर को हटाने की बजाय वहां से किनारे होकर निकल गए।
कुछ समय बाद वहाँ से और भी लोग गुजरे और उन्होंने इसके लिए राजा को जिम्मेद्दार ठहराया और उन्होंने कहा कि इसमें राजा की गलती है कि वह सड़क को साफ़ नहीं करवाता। लेकिन उनमें से किसी ने भी रास्ते के उस पत्थर को हटाने की कोशिश नहीं की।
तभी वहाँ से एक किसान अपने सिर पर सब्जियों का भार लेकर गुजर रहा था। उसने उस पत्थर को हटाने के लिए अपने सिर का भार उस भारी पत्थर के बगल में रख दिया और उस पत्थर को रास्ते से हटाने का प्रयास (Effort) करने लगा।
काफी प्रयास करने के बाद किसान ने उस पत्थर को रास्ते से हटाकर किनारे कर दिया।
उसके बाद किसान (farmer) अपने सब्जियों को उठाने के लिए वापस आया। उसने देखा कि जहाँ पर पहले पत्थर पड़ा हुआ था वहां पर एक पर्स पड़ा हुआ है। उस पर्स में बहुत सारे सोने के सिक्के थे और राजा के द्वारा लिखा हुआ एक पत्र था जिसमे लिखा हुआ था कि यह सोना उसके लिए है जिसने इस रास्ते के पत्थर को हटाया है।
जीवन में आने वाली हर बाधा हमें अपनी परिस्थितियों को बेहतर बनाने का मौका (opportunity) देती है। आलसी इस चीज को लेकर शिकायत करते रहते हैं और बहादुर लोग अपने दयालु दिल, उदारता और काम करने की इच्छा के माध्यम से इसको अवसर में बदल देते हैं।
इसलिए जब भी हमारे जीवन में कोई बुरा वक्त आये तो हमें घबराने की बजाय उसका डटकर सामना करना चाहिए और उसे अच्छे पल में बदलने की कोशिश करनी चाहिए।

एक दोहे ने कितनी जिंदगियां बदल दी…… “बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिताय। एक पलक के कारने, क्यों कलंक लग जाय ।”

 🔄परिवर्तन🔄⭕️

♦ एक राजा को राज भोगते हुए काफी समय हो गया था । बाल भी सफ़ेद होने लगे थे । एक दिन उसने अपने दरबार में एक उत्सव रखा और अपने गुरुदेव एवं मित्र देश के राजाओं को भी सादर आमन्त्रित किया । उत्सव को रोचक बनाने के लिए राज्य की सुप्रसिद्ध नर्तकी को भी बुलाया गया ।

♦ राजा ने कुछ स्वर्ण मुद्रायें अपने गुरु जी को भी दीं, ताकि यदि वे चाहें तो नर्तकी के अच्छे गीत व नृत्य पर वे उसे पुरस्कृत कर सकें । सारी रात नृत्य चलता रहा । ब्रह्म मुहूर्त की बेला आयी । नर्तकी ने देखा कि मेरा तबले वाला ऊँघ रहा है, उसको जगाने के लिए नर्तकी ने एक दोहा पढ़ा –
“बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिताय।
एक पलक के कारने, क्यों कलंक लग जाय ।”

♦ अब इस दोहे का अलग-अलग व्यक्तियों ने अपने अनुरुप अलग-अलग अर्थ निकाला । तबले वाला सतर्क होकर बजाने लगा ।

♦ जब यह बात गुरु जी ने सुनी तो उन्होंने सारी मोहरें उस नर्तकी के सामने फैंक दीं ।

♦ वही दोहा नर्तकी ने फिर पढ़ा तो राजा की लड़की ने अपना नवलखा हार नर्तकी को भेंट कर दिया ।

♦ उसने फिर वही दोहा दोहराया तो राजा के पुत्र युवराज ने अपना मुकट उतारकर नर्तकी को समर्पित कर दिया ।

♦ नर्तकी फिर वही दोहा दोहराने लगी तो राजा ने कहा – “बस कर, एक दोहे से तुमने वैश्या होकर भी सबको लूट लिया है ।”

♦ जब यह बात राजा के गुरु ने सुनी तो गुरु के नेत्रों में आँसू आ गए और गुरु जी कहने लगे – “राजा ! इसको तू वैश्या मत कह, ये तो अब मेरी गुरु बन गयी है । इसने मेरी आँखें खोल दी हैं । यह कह रही है कि मैं सारी उम्र संयमपूर्वक भक्ति करता रहा और आखिरी समय में नर्तकी का मुज़रा देखकर अपनी साधना नष्ट करने यहाँ चला आया हूँ, भाई ! मैं तो चला ।” यह कहकर गुरु जी तो अपना कमण्डल उठाकर जंगल की ओर चल पड़े ।

♦ राजा की लड़की ने कहा – “पिता जी ! मैं जवान हो गयी हूँ । आप आँखें बन्द किए बैठे हैं, मेरी शादी नहीं कर रहे थे और आज रात मैंने आपके महावत के साथ भागकर अपना जीवन बर्बाद कर लेना था । लेकिन इस नर्तकी ने मुझे सुमति दी है कि जल्दबाजी मत कर कभी तो तेरी शादी होगी ही । क्यों अपने पिता को कलंकित करने पर तुली है ?”

♦ युवराज ने कहा – “पिता जी ! आप वृद्ध हो चले हैं, फिर भी मुझे राज नहीं दे रहे थे । मैंने आज रात ही आपके सिपाहियों से मिलकर आपका कत्ल करवा देना था । लेकिन इस नर्तकी ने समझाया कि पगले ! आज नहीं तो कल आखिर राज तो तुम्हें ही मिलना है, क्यों अपने पिता के खून का कलंक अपने सिर पर लेता है । धैर्य रख ।”

♦ जब ये सब बातें राजा ने सुनी तो राजा को भी आत्म ज्ञान हो गया । राजा के मन में वैराग्य आ गया । राजा ने तुरन्त फैसला लिया – “क्यों न मैं अभी युवराज का राजतिलक कर दूँ ।” फिर क्या था, उसी समय राजा ने युवराज का राजतिलक किया और अपनी पुत्री को कहा – “पुत्री ! दरबार में एक से एक राजकुमार आये हुए हैं । तुम अपनी इच्छा से किसी भी राजकुमार के गले में वरमाला डालकर पति रुप में चुन सकती हो ।” राजकुमारी ने ऐसा ही किया और राजा सब त्याग कर जंगल में गुरु की शरण में चला गया ।

 

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नवोदय  सिल्वर जुबली एनुअल फंक्शन के दौरान प्यारी यादें

♦यह सब देखकर नर्तकी ने सोचा – “मेरे एक दोहे से इतने लोग सुधर गए, लेकिन मैं क्यूँ नहीं सुधर पायी ?” उसी समय नर्तकी में भी वैराग्य आ गया । उसने उसी समय निर्णय लिया कि आज से मैं अपना बुरा धंधा बन्द करती हूँ और कहा कि “हे प्रभु ! मेरे पापों से मुझे क्षमा करना । बस, आज से मैं सिर्फ तेरा नाम सुमिरन करुँगी ।”

♦ समझ आने की बात है, दुनिया बदलते देर नहीं लगती । एक दोहे की दो लाईनों से भी हृदय परिवर्तन हो सकता है । बस, केवल थोड़ा धैर्य रखकर चिन्तन करने की आवश्यकता है ।

♦ प्रशंसा से पिघलना नहीं चाहिए, आलोचना से उबलना नहीं चाहिए । नि:स्वार्थ भाव से कर्म करते रहें । क्योंकि इस धरा का, इस धरा पर, सब धरा रह जायेगा

समय के साथ साथ सयम भी आवश्यक है

📝📚 जी. के. मोरवाल

एक राजा बहुत बड़े दानवीर थे। उनकी ये एक खास बात थी कि जब वो दान देने के लिए हाथ आगे बढ़ाते तो अपनी नज़रें नीचे झुका लेते थे।. ऐसी देनी देन जु कित सीखे हो सेन। ज्यों ज्यों कर ऊँचौ करौ त्यों त्यों नीचे नैन।।

एक राजा बहुत बड़े दानवीर थे। उनकी ये एक खास बात थी कि जब वो दान देने के लिए हाथ आगे बढ़ाते तो अपनी नज़रें नीचे झुका लेते थे।

ये बात सभी को अजीब लगती थी कि ये राजा कैसे दानवीर हैं। ये दान भी देते हैं और इन्हें शर्म भी आती है।

ये बात जब एक कवि तक पहुँची तो उन्होंने राजा को चार पंक्तियाँ लिख भेजीं जिसमें लिखा था-

ऐसी देनी देन जु
कित सीखे हो सेन।
ज्यों ज्यों कर ऊँचौ करौ
त्यों त्यों नीचे नैन।।

इसका मतलब था कि राजा तुम ऐसा दान देना कहाँ से सीखे हो? जैसे जैसे तुम्हारे हाथ ऊपर उठते हैं वैसे वैसे तुम्हारी नज़रें तुम्हारे नैन नीचे क्यूँ झुक जाते हैं?

राजा ने इसके बदले में जो जवाब दिया वो जवाब इतना गजब का था कि जिसने भी सुना वो राजा का कायल हो गया।
इतना प्यारा जवाब आज तक किसी ने किसी को नहीं दिया।

राजा ने जवाब में लिखा –

देनहार कोई और है
भेजत जो दिन रैन।
लोग भरम हम पर करैं
तासौं नीचे नैन।।

Rajni Rajasthan with Ganesh Morwal and Anurag Kumawat
श्याम सुंदर स्वरूप मधुर संगीत रस भजन संध्या के दौरान श्रीमती रजनी राजस्थानी जी के साथ चर्चा के दौरान सेल्फी 

मतलब, देने वाला तो कोई और है वो मालिक है वो परमात्मा है वो दिन रात भेज रहा है। परन्तु लोग ये समझते हैं कि मैं दे रहा हूँ राजा दे रहा है। ये सोच कर मुझे शर्म आ जाती है और मेरी आँखें नीचे झुक जाती हैं।

वो ही करता और वो ही करवाता है, क्यों बंदे तू इतराता है।

एक साँस भी नही है तेरे बस की, वो ही सुलाता और वो ही जगाता है ।