12 जनवरी : स्वामी विवेकानंद जन्मदिन उनके ये विचार और आदर्श युवाओं में नई शक्ति और ऊर्जा का संचार कर सकते हैं।

12 जनवरी : स्वामी जन्मदिन

‘उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक मंजिल प्राप्त न हो जाए’ का संदेश देने वाले युवाओं के प्रेरणास्त्रो‍त, समाज सुधारक युवा युग-पुरुष ‘स्वामी विवेकानंद’ का जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता (वर्तमान में कोलकाता) में हुआ। इनके जन्म

दिन को ही राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

उनका जन्मदिन राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाए जाने का प्रमु्ख कारण उनका दर्शन, सिद्धांत, अलौकिक विचार और उनके आदर्श हैं, जिनका उन्होंने स्वयं पालन किया और भारत के साथ-साथ अन्य देशों में भी उन्हें स्थापित किया। उनके ये विचार और आदर्श युवाओं में नई शक्ति और ऊर्जा का संचार कर सकते हैं। उनके लिए प्रेरणा का एक उम्दा स्त्रोत साबित हो सकते हैं।

किसी भी देश के युवा उसका भविष्य होते हैं। उन्हीं के हाथों में देश की उन्नति की बागडोर होती है। आज के पारिदृश्य में जहां चहुं ओर भ्रष्टाचार, बुराई, अपराध का बोलबाला है जो घुन बनकर देश को अंदर ही अंदर खाए जा रहे हैं। ऐसे में देश की युवा शक्ति को जागृत करना और उन्हें देश के प्रति कर्तव्यों का बोध कराना अत्यंत आवश्यक है। विवेकानंद जी के विचारों में वह क्रांति और तेज है जो सारे युवाओं को नई चेतना से भर दे। उनके दिलों को भेद दे। उनमें नई ऊर्जा और सकारात्कमता का संचार कर दे।

की ओजस्वी वाणी भारत में तब उम्मीद की किरण लेकर आई जब भारत पराधीन था और भारत के लोग अंग्रेजों के जुल्म सह रहे थे। हर तरफ सिर्फ दु्‍ख और निराशा के बादल छाए हुए थे। उन्होंने भारत के सोए हुए समाज को जगाया और उनमें नई ऊर्जा-उमंग का प्रसार किया।

सन् 1897 में मद्रास में युवाओं को संबोधित करते हुए कहा था ‘जगत में बड़ी-बड़ी विजयी जातियां हो चुकी हैं। हम भी महान विजेता रह चुके हैं। हमारी विजय की गाथा को महान सम्राट अशोक ने धर्म और आध्यात्मिकता की ही विजयगाथा बताया है और अब समय आ गया है भारत फिर से विश्व पर विजय प्राप्त करे। यही मेरे जीवन का स्वप्न है और मैं चाहता हूं कि तुम में से प्रत्येक, जो कि मेरी बातें सुन रहा है, अपने-अपने मन में उसका पोषण करे और कार्यरूप में परिणत किए बिना न छोड़ें।

Vivekanand In Hindi

हमारे सामने यही एक महान आदर्श है और हर एक को उसके लिए तैयार रहना चाहिए, वह आदर्श है भारत की विश्व पर विजय। इससे कम कोई लक्ष्य या आदर्श नहीं चलेगा, उठो भारत…तुम अपनी आध्यात्मिक शक्ति द्वारा विजय प्राप्त करो। इस कार्य को कौन संपन्न करेगा?’ स्वामीजी ने कहा ‘मेरी आशाएं युवा वर्ग पर टिकी हुई हैं’।

स्वामी जी को यु्वाओं से बड़ी उम्मीदें थीं। उन्होंने युवाओं की अहं की भावना को खत्म करने के उद्देश्य से कहा है ‘यदि तुम स्वयं ही नेता के रूप में खड़े हो जाओगे, तो तुम्हें सहायता देने के लिए कोई भी आगे न बढ़ेगा। यदि सफल होना चाहते हो, तो पहले ‘अहं’ ही नाश कर डालो।’ उन्होंने युवाओं को धैर्य, व्यवहारों में शुद्ध‍ता रखने, आपस में न लड़ने, पक्षपात न करने और हमेशा संघर्षरत् रहने का संदेश दिया।

आज भी स्वामी विवेकानंद को उनके विचारों और आदर्शों के कारण जाना जाता है। आज भी वे कई युवाओं के लिए प्रेरणा के स्त्रोत बने हुए हैं

 

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जरूरत है धर्म को व्यवहार और आचरण में लाने की

जरूरत है धर्म को व्यवहार और आचरण में लाने की
धर्म के बारे में अनेक मान्यताएँ प्रचलित हैं जिसके कारण अनेक सम्प्रदायों और व्यक्तियों में ईष्या-द्वेष, वैमन्सय और कई साम्प्रदायिक दंगे और धूर्ततापूर्ण व्प्यवहार होते आ रहे हैं। अनेक राजैनतिक और धार्मिक नेता व मसीहे अपने ढंग से धर्म की व्याख्या देकर स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं।
ऐसे लोग धर्म का संकुचित अर्थ देते हैं और फिर ऐसी संकीर्ण भावनाओं के कारण विभिन्न जातियों, दलों व वर्गो में अलगाव और कटुता बल पकड़ रही है। लोग मत या मजहब को ही धर्म का नाम देने लगे हैं। वास्तविक धर्म कभी संकीर्णता और कट्टरवाद का उपेदष नहीं देता। धर्म एक जीवन पद्धति है।
मनुष्य का धर्म क्या है? ईष्वर ने मनुष्य को जो योग्यता दी है, उसे योग्यता के अनुरूप जीवन में शक्ति सुरक्षित रखे तो यही धर्म का रूप है। जैसे किसी फल विषेष का वृक्ष लगाते हैं तो उससे उसी फल की आषा करते हैं। जब हम ईष्वर प्रदत्त योग्यता के अनुसार आचरण नहीं करते और अपनी योग्यता खो देते हैं तो हम धर्म से गिर जाते हैं, धर्म से भ्रष्ट हो जाते हैं । संसार के लगभग सब धार्मिक सम्प्रदाय अपने को अच्छा और दूसरों को बुरा कहते हैं, परन्तु मनुष्य बनने पर कोई बल नहीं देता। वेद का मानव धर्म सभी को मनुष्य बनने के लिए प्रेरित करता है- मनुर्भव- हे मानव तू मनुष्य अर्थात् मननषील बन। मनुष्य प्रकृति के राज्य में सबसे अधिक उन्नत व विलक्षण प्राणी है।
अनन्तकाल से पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाष आदि सब अपना-अपना धर्म निभा रहे हैं, निरन्तर चलते ही रहते हैं, कभी ठहरते नहीं। जब यह सब तत्व अपने धर्म का पालन करते हैं तो मनुष्य ही अपने धर्म पथ को क्यों कर छोड़े ?
हमारा धर्म है धैर्य को बनाए रखना। कैसी भी स्थिति हो धैर्य नहीं खोना चाहिए। हमारे जीवन मेें अनेक बार सुख-दुख, रोग, आरोग्य, रात-दिन आते हैं। सात्विक धर्म अगर बना रहे तो हमारा मन व्याकुल नहीं होगा और न ही चिन्ताग्रस्त होगा। कई बार अनावष्यक चिन्ता करके भविष्य को खतरे में डाल देते हैं।
हम कोई भी  काम करें – सामाजिक व व्यापारिक-धर्म उसमें विष्वसनीयता लाता है। धर्म का सार जीवन में संयम का होना है। मनुष्य की मनुष्यता, मानव की मानवता एक कसौटी पर रहती है। हम तभी श्रेष्ठ माने जाएंगे जब हम अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करें और उसका उत्तरदायित्व हम पर ही है। अपने मन को पवित्र रखने की जो पद्धति है, उसी को धर्म कहते हैं। हृदय की पवित्रता ही धर्म का वास्तविक स्वरूप् है। हमारे वेद, शास्त्र कहते हैं कि जिस कर्म से हमारे मनोरथ की सिद्धि हो, हमारी वृद्धि हो, उन्नति हो और हम संसार बन्धन से मुक्त हो जाएं, उसको धर्म कहते हैं।
संसार में उन्नति तभी सम्भव है जब समस्त मानव समाज की उन्नति हेतु एक जैसा एक साथ प्रयत्न किया जाए, जिसमें परस्पर भेदभाव लेषमात्र भी न हो । वास्तव में यही मानव धर्म है। हम परस्पर एक दूसरे की रक्षा करें। जिन शुभ कर्मो से सुख, शान्ति, ज्ञान आदि सद्गुणों की वृद्धि हो अर्थात् शारीरिक, आत्मिक, मानसिक उन्नति हो, वही धर्म है।
मनुष्य होना साधारण बात नहीं है। जीव स्वयं ही कर्म करता है, स्वयं ही उन कर्मो का फल, सुख-दुख भोगता है। परलोक मार्ग में केवल मनुष्य का धर्म ही साथ जाता है। इस चराचर जगत् में लक्ष्मी, प्राण, यौवन और जीवन सभी कुछ नाषवान हैं, केवल एक धर्म ही निष्चल है। संसार में सत्य ही ईष्वर है। सदा सत्य के आधार पर ही धर्म स्थिर है। सत्य से बढ़ कर दूसरी कोई मुक्ति नहीं है। जो स्थान-स्थान पर भटकता है वह परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकता। ईष्वर एक ही है, उसी की उपासना करनी चाहिए। धर्म के अभाव में मनुष्य का इधर-उधर भटकना, चिन्ता करना, बीती बातों के लिए शोक करना, क्रोध, घृणा आदि शेष रह जाता है। मनुष्य जीवन को सफल करने के लिए धर्म की आवष्यकता है। धर्म हमारे ज्ञान, कर्म और भाव के लिए होना चाहिए । धर्माचरण जीवन की नींव है।
हम लोग जीवन पर्यन्त तरह-तरह के प्रवचन सुनते हैं, धर्म स्थलों पर जाते हैं, अनुष्ठान, व्रत, जागरण, तीर्थ यात्राएं करते हैं, रामायण, गीता आदि सुनते और पढ़ते हैं। परंतु अगर हम अपने जीवन के मनोविकार या अन्य बुराइयों को दूर न कर सकें तो यह अधर्म है। जैसे हम रहना चाहते हैं, वैसा दूसरे भी रहना चाहते हैं। जीओ और दूसरों को जीने दो। अपने को जीवित रखना और दूसरों को जीवित रहने में मदद करना यह हमारा धर्म है। प्यासे को पानी दें, यह धर्म है। भूखे को अन्न दें, यह धर्म है। नंगे को कपड़ा दें, यह धर्म है। जिसके पास दवा नहीं, उसे दवा दें, यह धर्म है। धर्म को व्यवहार और आचरण में लाने की आवष्यकता है। केवल धार्मिक दिखने भर से काम नहीं चलेगा, किन्तु धार्मिक बनना होगा। मनु महाराज के अनुसार धर्म के दस लक्षण हैं- धैर्यषीलता, क्षमाषीलता, दृढ़ता, किसी की चोरी न करना, भीतर-बाहर की पवित्रता, इन्द्रियों का संयम, बुद्धिमता, ज्ञानषीलता, सत्यता और अक्रोधी होना। हमारे कर्म शुद्ध हों, इन्द्रियाँ शुद्ध हों, भावनाएं शुद्ध हों, विचार शुद्ध हों, अहंभाव न हो, यह सब धर्म की पद्धति है।

इनसानियत व मानवता सबसे बड़ा धर्म है । कहते हैं दुनिया में कोई ऐसी शक्ति नहीं है जो इनसान को गिरा सके, इन्सान ,इन्सान द्वारा ही गिराया जाता है ।

इनसानियत व मानवता सबसे बड़ा धर्म है । कहते हैं दुनिया में कोई ऐसी शक्ति नहीं है जो इनसान को गिरा सके, इन्सान ,इन्सान द्वारा ही गिराया जाता है । दुनिया में ऐसा नहीं है कि सभी लोग बुरे हैं, इस जगत में अच्छे-बुरे लोगों का संतुलन है । आज संस्कारों का चीरहरण हो रहा है ,खूनी रिश्ते खून बहा रहे हैं । संस्कृति का विनाश हो रहा है । दया ,धर्म ,ईमान का नामेानिशान मिट चुका है ।इनसान खुदगर्ज बनता जा रहा है । दुनिया में लोगों की सोच बदलती जा रही है । निजी स्वार्थों के लिए कई जघन्य अपराध हो रहे हैं। बुराई का सर्वत्र बोलबाला हो रहा है। आज ईमानदारों को मुख्यधारा से हाशिए पर धकेला जा रहा है।गिरगिटों व बेईमानों को गले से लगाया जा रहा है। विडंवना देखिए कि आज इनसान रिश्तों को कलंकित कर रहा है। भाई-भाई के खून का प्यासा है ,जमीन जायदाद के लिए मां-बाप को मौत के घाट उतारा जा रहा है। आज माता -पिता का बंटवारा हो रहा है। आज बुजुर्ग दाने- दाने का मोहताज है। कलयुगी श्रवणों का बोलबाला है।आज संतानें मां-बाप को वृद्ध आश्रमों में भेज रही हैं। शायद यह बुजुर्गों का दुर्भागय है कि जिन बच्चों की खातिर भूखे प्यासे रहे, पेट काटकर जिन्हे सफलता दिलवाई आज वही संतानें घातक सिद्व हो रही हैं। मां-बाप दस बच्चों को पाल सकते हैं, लेकिन दस बच्चे मां-बाप का बंटवारा कर रहे हैं। साल भर उन्हें महिनों में बांटा जाता है। वर्तमान परिवेश में ऐसे हालात देखने को मिल रहे है। बेशक ईश्वर ने संसार में करोड़ों जीव जन्तु बनाए, लेकिन इनसान सबसे अहम कृति बनाई। लेकिन ईश्वर की यह कृति पथभ्रष्ट हो रही है। आज सड़को पर आदमी तड़फ-तड़फ कर मर रहा है । इनसान पशु से भी बदतर होता जा रहा है। क्योकि यदि पशु को एक जगह खूंटे से बांध दिया जाए, तो वह अपने आप को उसी अवस्था में ढाल लेता है। जबकि मानव परिस्थितियों के मुताबिक गिरगिट की तरह रंग बदलता है। आज पैसे का बोलबाला है। ईमानदारी कराह रही है। अच्छाई बिलख रही है, भाईचारा, सहयोग, मदद एक अंधेरे कमरे में सिमट गये हैं। आत्मा सिसक रही है। वर्तमान में अच्छे व संस्कारवान मनुष्य की कोई गिनती नहीं है। चोर उच्चकों ,गुंडे, मवालिओं का आदर सत्कार किया जाता है। आज हंस भीड में खोते जा रहे हैं,कौओं को मंच मिल रहा है। हजारों कंस पैदा हो रहे हैं एक कृष्ण कुछ नहीं कर सकता। आज कतरे भी खुद को दरिया समझने लगे है लेकिन समुद्र का अपना आस्तित्व है। मानव आज दानव बनता जा रहा है। संवेदनाएं दम तोड़ रही हैं। मानव आज लापरवाही से जंगलों में आग लगा रहा है उस आग में हजारों जीव-जन्तु जलकर राख हो रहे हैं। जंगली जानवर शहरों की ओर भाग रहे हैं, जबकि सदियां गवाह है कि शहरों व आबादी वाले इलाकों में कभी नहीं आते थे, मगर जब मानव ने जानवरों का भोजन खत्म कर दिया। जीव-जन्तओं को काट खाया तो जंगली जानवर भूख मिटाने के लिए आबादी का ही रूख करेंगें। नरभक्षी बनेगें । आज संवेदनशीलता खत्म होती जा रही है। आज मानव मशीन बन गया है निजी स्वार्थो के आगे अंधा हो चुका है। अपने ऐशों आराम में मस्त है। दुनिया से कोई लेना देना नहीं है। संस्कारों का जनाजा निकाला जा रहा है। मर्यादाएं भंग हो रही हैं। मानव सेवा परम धर्म है। आज लोग भूखे प्यासे मर रहे हैं। दो जून की रोटी के लिए तरस रहे हैं। भूखमरी इतनी है कि शहरों में आदमी व कुते लोगों की फैंकी हुई जूठन तक एक साथ खाते हैं। आज मानव भगवान को न मानकर मानव निर्मित तथाकथित भगवानों को मान रहा है। आज मानव इतना गिर चुका है कि रिश्ते नाते भूल चुका है। रिश्तों में संक्रमण बढ़ता जा रहा है। मानव धरती के लिए खून कर रहा है । कई पीढियां गुजर गई मगर आज तक न तो धरती किसी के साथ गई न जाएगी। फिर यह नफरत व दंगा फसाद क्यों हो रहा है। मानव ,मानव से भेदभाव रि रहा है। उंच-नीच का तांडव हो रहा है। खून का रंग एक है फिर भी यह भेदभाव क्यों। यह बहुत गहरी खाई है इसे पाटना सबसे बडा धर्म है। आज लोग बिलासिता पर हजारों -लाखों रूपये पानी की तरह बहा देते हैं ,मगर किसी भूखे को एक रोटी नहीं खिला सकते। शराब पर पैसा उडा रहे हैं। अनैतिक कार्यो से पैसा कमा रहे हैं। पैसा पीर हो गया है ।मुंशी प्रेमचन्द ने कहा था कि जहां 100 में से 80 लोग भूखे मरते हों वहां शराब पीना गरीबों के खून पीने के बराबर है। भूखे को यदि रोटी दे दी जाए तो भूखे की आत्मा की तृप्ति देखकर जो आनन्द प्राप्त होगा वह सच्चा सुख है। आज प्रकृति से छेडछाड हो रही है। प्रकृति के बिना मानव प्रगति नहीं कर सकता। प्रकृति एक ऐसी देवी है जो भेदभाव नहीं करती ,प्रत्येक मानव को बराबर धूप व हवा दे रही है। मानव कृतध्न बनता जा रहा है। मंदिरों में दुष्कर्म हो रहे है ।आज मानव स्वार्थ की पट्टी के कारण अंधा होता जा रहा है। गाय पर अत्याचार हो रहा है। मानवीय मूल्यों का पतन होता जा रहा है। नफरत को छोड देना चाहिए। प्रत्येक मनुष्य की सहायता करनी चाहिए। भगवान के पास हर चीज का लेखा -जोखा है। ईश्वर की चक्की जब चलती है तो वह पाप व पापी को पीस कर रख देती है मानव सेवा ही नारायण सेवा है। यह अटल सत्य है। भगवान व शमशान को हर रोज याद करना चाहिए। किसी को दुखी नहीं करना चाहिए। अल्लाह की लाठी जब पडती है तो उसकी आवाज नहीं होती। ईश्वर इस धरा के कण -कण में विद्यमान है ।

*वन्देमातरम 🚩 का_संक्षिप्त इतिहास* 📚 ————-///———– 7 नवम्वर 1876बंगाल के कांतल पाडा गांव में बंकिम चन्द्र चटर्जी ने ‘वंदे मातरम’ की रचना की।

*वन्देमातरम 🚩 का_संक्षिप्त इतिहास* 📚
————-///———–
7 नवम्वर 1876बंगाल के कांतल पाडा गांव में बंकिम चन्द्र चटर्जी ने ‘वंदे मातरम’ की रचना की।

1882 वंदे मातरम बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय के प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंद मठ’ में सम्मिलित।

1896 रवीन्द्र नाथ टैगोर ने पहली बार ‘वंदे मातरम’ को बंगाली शैली में लय और संगीत के साथ कलकत्ता के कांग्रेस अधिवेशन में गाया।

मूलरूप से ‘वंदे मातरम’ के प्रारंभिक दो पद संस्कृत में थे, जबकि शेष गीत बांग्ला भाषा में।
वंदे मातरम् का अंग्रेजी अनुवाद सबसे पहले अरविंद घोष ने किया।

दिसम्बर 1905 में कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में गीत को राष्ट्रगीत का दर्जा प्रदान किया गया, बंग भंग आंदोलन में ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रीय नारा बना।

1906 में ‘वंदे मातरम’ देव नागरी लिपि में प्रस्तुत किया गया, कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर ने इसका संशोधित रूप प्रस्तुत किया।

1923 कांग्रेस अधिवेशन में वंदे मातरम् के विरोध में स्वर उठे।

पं॰ नेहरू, मौलाना अब्दुल कलाम अजाद, सुभाष चंद्र बोस और आचार्य नरेन्द्र देव की समिति ने 28 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में पेश अपनी रिपोर्ट में इस राष्ट्रगीत के गायन को अनिवार्य बाध्यता से मुक्त रखते हुए कहा था कि इस गीत के शुरुआती दो पैरे ही प्रासंगिक है, इस समिति का मार्गदर्शन रवीन्द्र नाथ टैगोर ने किया।

14 अगस्त 1947 की रात्रि में संविधान सभा की पहली बैठक का प्रारंभ ‘वंदे मातरम’ के साथ और समापन ‘जन गण मन..’ के साथ..।

1950 ‘वंदे मातरम’ राष्ट्रीय गीत और ‘जन गण मन’ राष्ट्रीय गान बना।

2 002 बी.बी.सी. के एक सर्वेक्षण के अनुसार ‘वंदे मातरम्’ विश्व का दूसरा सर्वाधिक लोकप्रिय गीत था ।

-🖋*डॉ विश्वास चौहान*

अंग्रेजी नववर्ष पर राष्ट्रकविता:- ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं, है अपना ये त्यौहार नहीं, है अपनी ये तो रीत नहीं, है अपना ये व्यवहार नहीं।

अंग्रेजी नववर्ष पर राष्ट्रकविता:-

ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं,
है अपना ये त्यौहार नहीं,
है अपनी ये तो रीत नहीं,
है अपना ये व्यवहार नहीं।

धरा ठिठुरती है शीत से,
आकाश में कोहरा गहरा है,
बाग़ बाज़ारों की सरहद पर
सर्द हवा का पहरा है।

सूना है प्रकृति का आँगन
कुछ रंग नहीं, उमंग नहीं,
हर कोई है घर में दुबका हुआ
नव वर्ष का ये कोई ढंग नहीं।

चंद मास अभी इंतज़ार करो,
निज मन में तनिक विचार करो,
नये साल नया कुछ हो तो सही,
क्यों नक़ल में सारी अक्ल बही।

ये धुंध कुहासा छंटने दो,
रातों का राज्य सिमटने दो,
प्रकृति का रूप निखरने दो,
फागुन का रंग बिखरने दो।

प्रकृति दुल्हन का रूप धर,
जब स्नेह – सुधा बरसायेगी,
शस्य – श्यामला धरती माता,
घर -घर खुशहाली लायेगी।

तब चैत्र-शुक्ल की प्रथम तिथि,
नव वर्ष मनाया जायेगा।
आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर,
जय-गान सुनाया जायेगा।।

🙏हमारा(आर्यो का) नवसवंत्सर(विक्रमी संवत्) 2075 चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (यानी 6 अप्रैल 2019) से शुरू हो रहा है।🇮🇳

🙏अतः विनम्र प्रार्थना है कि इस अनुरोध को स्वीकार करे और हमे भारतीय नव वर्ष(विक्रमी संवत) की बधाई दिजिएगा।आशा है आप उस दिन सभी को बधाई जरूर देगे। सत्य सनातन वैदिक धर्म की जय हो

तू अपनी खूबियां ढूंढ, कमियां निकालने के लिए लोग हैं|

तू अपनी खूबियां ढूंढ,
कमियां निकालने के लिए
लोग हैं|

अगर रखना ही है कदम तो आगे रख,
पीछे खींचने के लिए
लोग हैं|

सपने देखने ही है तो ऊंचे देख,
निचा दिखाने के लिए
लोग हैं|

अपने अंदर जुनून की चिंगारी भड़का,
जलने के लिए
लोग हैं|

अगर बनानी है तो यादें बना,
बातें बनाने के लिए
लोग हैं|

प्यार करना है तो खुद से कर,
दुश्मनी करने के लिए
लोग है|

रहना है तो बच्चा बनकर रह,
समझदार बनाने के लिए
लोग है|

भरोसा रखना है तो खुद पर रख,
शक करने के लिए
लोग हैं|

तू बस सवार ले खुद को,
आईना दिखाने के लिए
लोग हैं|

खुद की अलग पहचान बना,
भीड़ में चलने के लिए
लोग है|

तू कुछ करके दिखा दुनिया को,
तालियां बजाने के लिए
लोग हैं|..

समय चला , पर कैसे चला पता ही नहीं चला

समय चला , पर कैसे चला
पता ही नहीं चला

ज़िन्दगी की आपाधापी में ,
कब निकली उम्र हमारी यारो ,
पता ही नहीं चला ,

कंधे पर चढ़ने वाले बच्चे ,
कब कंधे तक आ गए ,
पता ही नहीं चला ,

किराये के घर से शुरू हुआ था सफर अपना ,
कब अपने घर तक आ गए ,
पता ही नहीं चला ,

साइकिल के पैडल मारते हुए
हांफते थे उस वक़्त,
कब से हम कारों में घूमने लगे हैं ,
पता ही नहीं चला ,

कभी थे जिम्मेदारी हम माँ बाप की ,
कब बच्चों के लिए हुए जिम्मेदार हम ,
पता ही नहीं चला ,

एक दौर था जब दिन में भी
बेखबर सो जाते थे ,
कब रातों की उड़ गई नींद ,
पता ही नहीं चला ,

जिन काले घने बालों पर
इतराते थे कभी हम ,
कब सफेद होना शुरू कर दिया ,
पता ही नहीं चला ,

दर दर भटके थे नौकरी की खातिर ,
कब रिटायर होने का समय आ गया ,
पता ही नहीं चला ,

बच्चों के लिए कमाने बचाने में
इतने मशगूल हुए हम ,
कब बच्चे हमसे हुए दूर ,
पता ही नहीं चला ,

भरे पूरे परिवार से सीना चौड़ा रखते थे हम ,
अपने भाई बहनों पर गुमान था ,
उन सब का साथ छूट गया ,
कब परिवार हम दो पर सिमट गया ,
*प ही नहीं चला ,

अब सोच रहे थे कुछ अपने
लिए भी कुछ करे ,
पर शरीर साथ देना बंद कर दिया ,
पता ही नहीं चला ,